अनूपपुर। चचाई ताप विद्युत गृह, मोजर बेयर पॉवर प्लांट, न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (टॉरेंट), अडानी थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट यह कंपनी जिस समय अपने सम्पूर्ण आवेग में आएँगे वह वक़्त और नजारा ऐसा होगा मानो आसमान में सिर्फ धुआँ ही धुआँ, जमीन में राख़ ही राख़ और इनके प्रदूषण से मानव फेफड़े रोजाना 100 सिगरेट एक साथ पीने का समान होगा। लेकिन इतनी बारीकी से चिंतन शायद इसलिए भी हो पाना या कर पाना संभव नहीं हैं कि तख्ती पर लिख दिया गया है “विकास बाबू” आएँगे। एक मशहूर कहावत है कि “बरगद अगर बूढ़ा हो जाय या गिर जाए तो बेशरम (बेहया) के पौधों की पूजा नहीं करते।”
ज्ञात होकि “ग्रीन बेल्ट वृक्षारोपण” विकसित करना अनिवार्य इसलिए भी है कि वह मानव जीवन के लिए सुगम हो सके। और इसके लिए जो कंपनियों के ब्लूप्रिंट हैं वह कैसे तैयार किया गया है यह सबसे छुपा हुआ है। आमतौर पर पावर प्लांटो के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने परिसर की कुल भूमि का 33% हिस्सा हरित पट्टी के रूप में विकसित करें लेकिन यह प्लांट स्थापित करते हुए संभव हो सकेगा या नहीं यह कहना पाना कठिन है। होना तो यह भी चाहिए कि प्लांट की बाउंड्री वॉल से अंदर की ओर कम से कम 50 मीटर से 100 मीटर तक की चौड़ी पट्टी में सघन वृक्षारोपण हो यह दूरी प्लांट की क्षमता उससे निकलने वाले उत्सर्जन पर निर्भर करती है। साथ ही जमीन के पास झाड़ियां और छोटे पौधे धूल को रोक सकें। मध्यम ऊंचाई के पेड़ जो हवा की गति को कम करें। ऊँचे और यह चौड़े पत्ते वाले पेड़ (जैसे नीम, पीपल, बरगद) जो CO2 और अन्य गैसों को सोखने में सक्षम में होते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार हरित पट्टी में ऐसे पेड़ होने चाहिए जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हो और जिसमें प्रदूषण सहने की क्षमता अधिक हो। प्लांट परिषर में प्रति हेक्टेयर कितने पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है और यह कब तक तैयार हो जाएगा यह बात पॉवर प्लांट के द्वारा पर्यावरण जन सुनवाई में खुलकर नहीं कह पा रहे हैं। माना तो यह भी जा रहा है कि जिन पीपल और बरगद के 50-100 साल पुराने वृक्ष काटे जा रहे हैं उन वृक्ष में प्रदूषण सोखने की क्षमता अधिक होती है ऐसे में अगर नए वृक्ष लगाए भी जाएंगे तो उतना ही समय लगेगा। और वर्तमान में वहां कितने पेड़ जीवित अवस्था में है क्या ग्रीन बेल्ट में लगाए जाने वाले पेड़ों की प्रजातियां का चयन स्थानी वन विभाग की परामर्श से किया जाएगा। जिसे पर उक्त प्लांट प्रबंधक बात करने को तैयार नहीं है।
न्यूजोन (टॉरेंट) के दो इकाई का प्लांट
2×800 एमडब्ल्यू (MW) यानि इसकी दो इकाई इतनी बड़ी क्षमता का प्लांट न केवल पर्यावरण बल्कि पूरे क्षेत्र के भूगोल और जनजीवन की स्थाई रूप से बदल देगा। और जो वृक्ष लगाए जाएंगे वह 2×800 (MW) की क्षमता से निकलने वाले प्रदूषण को सोख सकेगा। 2×800 की दो इकाई का यह पावर प्लांट प्रति घंटा हजारों टन कोयला जलाएगा इससे निकलने वाली गर्मी और चिमनियों से निकलने वाला धुआं आसपास के तापमान को दो से तीन डिग्री तक बढ़ा सकता है इससे “हीट आईलैंड इनफैक्ट” जो स्थानीय वर्षा चक्र और पक्षियों के प्रवास को प्रभावित करेगा। उसके लिए टॉरेंट कंपनी अपना प्लांट स्थापित करने से पहले क्या प्रबंध किया है यह स्थानीय रहवासियों के समझ से परे है। तथा फ्लाई एस का पहाड़ 2×800 एमडब्ल्यू (MW) प्लांट से प्रतिदिन हजारों टन राख निकलेगी यदि राख़ का ठीक से व्यवस्था न किया गया तो बारीक रख हवा में उड़कर आसपास के क्षेत्र सहित शहरी इलाके के रहवासियों के फेफड़े और किसानी इलाके के खेतों की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को नष्ट कर देगा। अनूपपुर पहले से ही अमरकंटक ताप विद्युत गृह चचाई और एमपी पॉवर प्लांट जैतहरी जैसे बड़े प्रोजेक्ट का भार सा रहा है क्या इस क्षेत्र व जिले की हवा, पानी में अब और प्रदूषण रोकने की क्षमता बची है क्या नए प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले पूरे जिले का सामूहिक प्रभाव आकलन कराया गया है। अगर कहा जाए तो बिलकुल नहीं। क्योंकि अगर कराया गया होता तो ऐसे जोखिम भरे निर्णय लेने से पहले विचार किया जाता। 2×800 के दो इकाई में बनने वाले प्लांट से आसपास के नदी तालाबों का सारा पानी सोख लेगा। ऐसे में “2×800 के दो इकाई का पावर प्लांट अगर विकास देगा तो वह क्षेत्र की स्थिति को नष्ट कर सतत विकास नहीं है।” तथा न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड 1320 एमडब्ल्यू (MW) का प्रस्तावित था। लेकिन बाद में इस पर वर्तमान में न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (टॉरेंट) जोकि सहायक कंपनी है का 280 एम डब्ल्यू (MW) का हिस्सा भी शामिल कर उक्त प्लांट को दो इकाई में विभाजित कर 2×800 एमडब्ल्यू (MW) कर दिया गया है। तो क्या उक्त पॉवर प्लांट 1320 एम डब्ल्यू (MW) पर्याप्त नहीं था या फिर जितने एमडब्ल्यू (MW) के भूमि अधिग्रहित की गई थी उसमें 800 एमडब्ल्यू (MW) का ही भार संभव था यह बड़ा यक्ष प्रश्न जिले की जनता जानना चाहती है। अवार्ड प्रस्ताव के प्र0क्र0/ 4-अ 82/ 10-11/ भू-अर्जन/2011 दिनांक 24 जनवरी 2011 के मुताबिक उक्त प्लांट पहले प्रारम्भिक सर्वेक्षण के अनुसार शहडोल जिले के ग्राम ब्यौहारी में प्रस्तावित किया गया था बाद में कंपनी द्वारा सर्वेक्षण के पश्चात् अनूपपुर जिले के ग्राम रक्सा, कोलमी में कुल 476.788 हे निजी एवं 39.776 हे. शासकीय भूमि का चयन किया गया तथा मप्र शासन ऊर्जा विभाग मंत्रालय भोपाल के पृष्ठांकन क्रमांक 8513/13/2009 दिनांक 20/11/2009 द्वारा इन उक्त ग्रामों में परियोजना की स्थापना हेतु अनुमति प्राप्त की गई। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसा क्या हुआ की पूर्व की प्रस्तावित स्थल को निरस्त कर अनूपपुर के प्रस्तावित करवाया गया। क्या शहडोल जिले को विकास की आवश्यकता नहीं है? या फिर वहां के रहवासी इतने जागरूक हैं कि अपने फेफड़े और गुर्दो की रक्षा करने में समर्थ्य हैं। जबकि अनूपपुर जिले के क्षेत्र में अमरकंटक ताप विद्युत गृह चचाई और एमपी पॉवर जैतहरी जैसे दो बड़े प्लांट का भार सहन कर रहा है क्योंकि बड़ी क्षमता का प्लांट है इसके बावजूद आबादी एवं प्राकृतिक सहन क्षमता से ऊपर उठकर 2×800 एमडब्ल्यू (MW) का पॉवर प्लांट स्थापित करने से अनूपपुर जिले की जनता के स्वास्थ्य के साथ खुला खिलवाड़ करने की अनुमति क्यों और किन शर्तो पर दी गई है। तथा जिनकी भूमि अधिग्रहित की गई है वह पहले अधिग्रहण की कार्रवाई से असंतुष्ट थे तथा प्रभावित किसानों ने कलेक्टर के समक्ष उपस्थित होकर कहा था कि “उक्त जमीन दो फसली है, सिंचित है। तथा मवेशियों का चारागाह, जलवाऊ लकड़ी, दातून एवं शादी इत्यादि के लिए वहीं से प्राप्त होती है। तथा सभी ग्रामवासियों का भरण-पोषण एवं समग्र विकास के लिए एक मात्र वही भूमि है। अगर हमारी भूमि में उक्त कंपनी द्वारा पॉवर प्लांट लगाया तो पूरा ग्रामवासी मर जाएंगे।” जिसकी परिभाषा कंपनी ने बदल दिया है? कब, कहाँ और कैसे यह विचारणीय है? क्षेत्रवासियों को स्थापित प्लांट में उच्च स्तर के नौकरी का अवसर प्रदान किया जाएगा या अन्य राज्यों के लोगों को ही नौकरी दी जाएगी। तथा उक्त प्लांट ग्राम रक्सा में निजी खाते से 238.676 हेक्टेयर 584 एकड़ भूमि चयनित एवं अधिग्रहित किया गया है। जिसमें कुछ सिंचित एवं कुछ असिंचित भूमि पाई गई एवं परिसम्पत्ति पर 3932 जलाऊ/इमरती एवं 623 फलदार वृक्ष पाए गए हैं। कुल मिलाकर 4555 वृक्ष पाए गए। उक्त भूमि पर मकान 08 मकान, कूप 08, हैंडपंप 01, तालाब 02 पाए सीधे तौर से कहा जाए तो पेड़ो की शिफ्टिंग के बजाए उन जलाऊ/इमरती एवं फलदार वृक्षों को काटा जाएगा न की 4555 वृक्ष तैयार करने के बाद ही प्लांट स्थापित किया जाएगा। हालांकि इसमें कुछ ऐसे भी पेड़ हैं जो अधिक ऑक्सीजन देने वाले वृक्ष हैं जैसे पीपल, बरगद जिन्हें तैयार होने में लगभग 50 से 100 साल लगते हैं। इस पर (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) NGT किस आधार पर उक्त प्लांट के निर्माण को हरी झंडी देगी। इसके अतिरिक्त जल स्रोत और अपशिष्ट प्रबंधन के साथ साथ प्लांट के लिए पानी का स्त्रोत क्या होगा क्या इसके लिए भूजल (ग्राउंडवाटर) निकालने का अनुमति लेंगे अगर ऐसा हुआ तो सम्भवतः आने वाले दिनों में जल स्तर और नीचे चला जाएगा। तथा फ्लाई ऐश के निस्तारण के लिए क्या योजना है ऐस पांड के लिए कितनी भूमि आवंटित की गई है और वह आबादी से कितनी दूर है। इस पर पॉवर प्लांट प्रबंधक को स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए।














