अनूपपुर। “क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम-वो इरादा!” ये पंक्तियाँ आज अनूपपुर की नदियों और जंगलों की सूनी आँखों में तैर रही हैं। जिस मिट्टी ने हमें जीवन दिया, आज उसी मिट्टी को उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए छलनी किया जा रहा है। अनूपपुर जिले में औद्योगिक विस्तार के नाम पर प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उसने अब क्रूरता की तमाम सीमाओं को लांघ दिया है। जहाँ नदियों पर बाँध बनाकर नदी के दम घोटे जा रहे हैं वहीं जंगलों की दनादन कटाई जारी है। जिले की जीवनदायिनी नदियाँ, जो कभी कल-कल बहती थीं, आज कंक्रीट के ढांचों और भारी मशीनों (पंपों) के शोर में दब गई हैं। उद्योगपतियों द्वारा अपने निजी स्वार्थ के लिए नदियों के प्रवाह को रोका जा रहा है और जंगलों को काटकर बड़े-बड़े प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। यह सिर्फ पर्यावरण का विनाश नहीं, बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकी तंत्र की हत्या है। ‘अमूक’ पशु जिस तरह बैठे हैं उस तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि जहाँ शीतल जल होना चाहिए था, वहां आज धूल, मशीनों का धुआँ और तपती रेत है। बेजुबान पशु, जो न बोल सकते हैं और न अपना हक माँग सकते हैं। जो इस भीषण तबाही के सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं। जल संकट नदियों के सूखने या प्रदूषित होने से पशुओं के पास पीने के पानी का कोई स्रोत नहीं बचेगा। आशियाना छिन जाएगा। जंगलों की कटाई ने पक्षियों के घोंसले और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को मलबे में तब्दील कर देगा। जिस गति से यहाँ अंधाधुंध निर्माण हो रहा है, आने वाले समय में जैव-विविधता केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी। जब शासक और रक्षक ही उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बन जाएँ, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? हम पूछना चाहते हैं कि क्या ‘विकास’ का अर्थ केवल मशीनों का शोर और बेजुबानों की मौत है? मनुष्यों की जरूरतों के नाम पर इन निर्दोष पशु-पक्षियों पर हो रहे अत्याचार को क्या प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है? “साहस का अर्थ केवल लड़ना नहीं हैं, बल्कि कमज़ोरों और बेजुबानों की रक्षा के लिए खड़े होना भी है। आज अनूपपुर को इसी साहस की आवश्यकता है।”
-राजकमल पांडे












