April 17, 2026 5:44 pm

RNI No : MPHIN / 2017 / 76083

best news portal development company in india

RNI No: MPHIN/2017/76083

“विकास कहे या विनाश” ग्राम पचखुरा और छतई के बीच बहने वाली जीवन दायनी केवई नदी का अस्तित्व संकट में, जल, जंगल और जमीन बचाने पर बहस

राजकमल पांडे और ओंकार सिंह की ग्राउंड रिपोर्ट

कोतमा।

अनूपपुर जिला कहे या मां नर्मदा कि नगरी कहे, जिसे हरित क्रांति जिला कह सकते थे। फसलो कि लहलहाती सुंदरता, पेड पौधों की मनमोहक आकर्षक दृश्य लोगों को देश विदेश से खींचता था, लेकिन अब उद्योगीकरण के कारण जिले में सिर्फ राख और राख नजर आता है चाहे वह वातावरण में मौजूद हो या फिर धरातल पर हो पूरे जिले में आपको फ्लाई ऐश ही नजर आता है।


ज्ञान हो कि अडानी थर्मल पावर प्रोजेक्ट को लेकर विवाद अब तूल पकड़ने लगा है तथा जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए जिलेवासियों के लिए उद्योगपति चुनौती बनते जा रहे हैं। और पर्यावरणीय बहस छिड़ गया है। अनूपपुर जिले के कोतमा क्षेत्र में अडानी की प्रस्तावित थर्मल कंपनी द्वारा केवई नदी पर बन रहे बाँध का विरोध प्रदर्शन अब तेज हो गया है। जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है और आसपास के किसान और आदिवासियों की जमीनें प्रभावित हो रही हैं। आरोप है कि अनूपपुर के कलेक्टर को इसकी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही है। और कार्य करने दिया जा रहा है ऐसे में यदि कार्रवाई नहीं हुई तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अनूपपुर जिले में जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए बड़ा जन आंदोलन का रूप ले लेगा।
सूत्रों से मिली प्राप्त जानकारी के अनुसार अडानी पावर की सहायक कंपनी अनूपपुर थर्मल एनर्जी (एमपी) प्राइवेट लिमिटेड है वह मुख्यत: वेल्स्पन एनर्जी का था। यह 4×800 MW (कुल 3200 MW) का अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल कोल-बेस्ड थर्मल पावर प्लांट है, जो छतई, मझटोलिया और उमरदा गांवों में प्रस्तावित है। पर्यावरण मंत्रालय ने 2024 में नए टर्म्स ऑफ रेफरेंस दिए और 2025 में पर्यावरण क्लीयरेंस की प्रक्रिया चल रही है। कुछ रिपोर्ट्स में इसे टाइगर कॉरिडोर और वन्यजीव क्षेत्रों के निकट होने के कारण चिंता जताई गई है। लेकिन दूसरी ओर जिस प्रकार से केवई नदी पर बाँध बनाकर जल प्रवाह को रोकना है। अभियंता कहते हैं कि यह साधारण बांध है महज तीन सालों के लिए है और जल के प्रवाह को चलने देने के लिए हम पाइपों के माध्यम से व्यवस्था बना देंगे, तीन फिट के ऊपर से पानी बहती रहेगी पाइपों के माध्यम से गेट नहीं बनाएंगे और तीन साल बाद डैम तोड़ देंगे, सोचने वाली बात है कि बांध में कंपनी की प्रदूषित जल को छोड़ा जाएगा। जिसका पानी आम जनमानस, वन्य जीव, स्थानीय जीव पशु पक्षी तथा मृदा प्रदूषण होती रहेगी। एवं कंपनी के चिमनी से निकलने वाले धुएं पर्यावरण को प्रदूषित कर मुनाफा कंपनी तथा रसूखदार व्यवस्थाओं को लाभान्वित करेगी केवई नदी पर बनने वाला बाँध कंपनी अपने निजी उपयोग के लिए बना रही तथा उक्त नदी का पानी दूषित कर, आसपास के किसानी इलाकों को प्रभावित कर, जलस्तर बिगाड़ कर बाँध को तोड़ दिया जाएगा। इससे साफ जाहिर है कि उद्योगपतियों को शासनिक और प्रशासनिक ढाल देकर अनूपपुर जिले में खुली गुंडई करने का लायसेंस केंद्र सरकार ने ही दिया होगा है। सीधे तौर से कहा जाए तो धन का केंद्रीकरण जो कुछ लोगों के हाथों में धन और शक्ति का जमावड़ा है। जिसका उदाहरण झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ में और अब मध्य प्रदेश में यह स्थानीय मुद्दा तूल पकड़ रहा है। जिसको सामाजिक एवं राजनीतिक बहस छिड़ना लाजमी है। जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए केवई नदी में बनने जा रहे बाँध का विरोध तो हो रहा है, लेकिन दूसरी ओर वह स्थानीय मजदूरों को काम देने बजाए बाहरी मजदूरों को काम देने का भी विरोध कर रहे हैं। यह स्पष्ट होता है कि जो प्रोजेक्ट जमीन पर है, वह स्थानीय और प्रभावित लोगों को लाभ नहीं दे पा रहे हैं तो क्या प्रोजेक्ट जब अपनी रफ़्तार में आ जाएगा, तब की स्थिति में एमबी पॉवर जैसे हाल नहीं होगा कि “बिना अनुमति अंदर आना मना है या मेल से अपॉइंटमेंट लेकर आइये।”

उद्योगपतियों के लिए औद्योगिक अखाडा बना अनूपपुर जिला

अभी ग्राम रक्सा-कोलमी में न्यूजोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का पर्यावरण पर प्रहार का मामला ठंडा भी नहीं हुआ और अडानी का थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट का मामला सामने आ गया है। जहाँ राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रभावित व्यक्तियों के बीच चिंता गहरा गया है। प्राइवेट कंपनियों ने अनूपपुर जिले का जल एवं वायु पर असंतुल पैदा करने के लिए सरकार के द्वारा भेजे गए उद्योगपतियों के रूप में बिना लगाम के घोड़े हैं जो अनूपपुर जिले के जल, जंगल और जमीन को निशाना बनाकर और विकास का सपना दिखा कर विनाश का अध्याय लिखना शुरू कर दिया है। वहीं बात करें आदिवासी क्षेत्रों इसके रोकथाम के लिए तो आदिवासी क्षेत्रों में पारदर्शिता और जागरूकता की कमी एक वास्तविक समस्या है दूसरी ओर इस विनाश को रोकने के लिए कुछ लोग अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। अनूपपुर जिले में अक्सर देखा गया है कि औद्योगिक इकाई के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), पब्लिक हियरिंग और ग्राम सभा की सहमति अक्सर विवादास्पद रहती है उसे वक्त रहते नहीं रोका जा सका है और यह पहले भी ताप विद्युत गृह चचाई और एमबी पॉवर के मामले देखा गया है। जहाँ दावे तो विकास के थे लेकिन धरातल अब कुछ और बयां कर रहे हैं। यही हाल अडानी प्रोजेक्ट में भी देखने मिल रहा है और यही हाल न्यूजोन प्राइवेट लिमिटेड (टॉरेंट) में हो रहा है।

बातें विकास की पर अनूपपुर कि धरती विनाश के कगार पर

एक तरफ लोग विकाश की बातें करते हैं इन्फ्रास्ट्रक्चर कि बात करते हैं कि बिना किसी इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र का विकाश नहीं किया जा सकता है और रोजगार कि संभावना नहीं की जा सकती है। पर यहां विकास कम विनाश की संभावना ज्यादा देखी जा रही है और अनूपपुर जिले में इन दिनों जल, जंगल और जमीन बचाओ अभियान आंदोलन तेज हो तो चुका हैं लेकिन वास्तविकता में लोगों को यह पता नहीं है कि जल और जंगल दोनों पर्यावरण को संतुलित बनाए रखते हैं पर उद्योगीकरण के चलते जल यानि नदियों का संरक्षण करने की जगह नदियों पर बांध बनाए जाने का काम निरंतर जारी है। और उस जिला प्रशासन सब कुछ जानते हुए महज मूकदर्शक बनी बैठी है। जल, जंगल और जमीन से मानव जीवन से लेकर अन्य जीव जंतु भी आश्रित है, एक तरफ जल संरक्षण की बात होती है तो वहीं दूसरी तरफ नदियों में बांध परियोजना बनाकर थर्मल पॉवर प्लांट कंपनियों को सौंपा जा रहा है। जहां कंपनियो से निकालने वाली प्रदूषित कचरे जल संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण अधिनियम की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं, नदियों में थर्मल पॉवर प्लांट कंपनियों के कचरे जल को प्रदूषित करते चले जाते हैं और उन्हीं नदियों के पानी को शुद्धि करण करके आम जनमानस को पिलाने का काम किया जाता है, जो पानी पहले साफ थी पर अब पानी का स्वाद और कलर दोनों अलग-थलग नजर आते प्रतीत होते हैं।

धरती पर मीठे पानी का स्त्रोत सिर्फ 0.6 प्रतिशत

महासागरों और समुद्रों में को मिलाकर धरती पर लगभग 97.5 प्रतिशत पानी खारा है और केवल 2.5 प्रतिशत मीठा पानी है, जिसमें से अधिकांश लगभग 68.7 प्रतिशत ग्लेशियरों और बर्फ की चोटियों में जमा है, और केवल लगभग 0.6% ही नदियों, झीलों और तालाबों में तरल रूप में है जो पीने और उपयोग के लिए उपलब्ध है। भूजल ज़मीन के नीचे ~30.1 प्रतिशत मीठे पानी,सतही जल नदियाँ, झीलें, दलदल ~1.2 प्रतिशत मीठे पानी के रूप में मौजूद है। जिसमें से मानव उपयोग में लाया है बाकी पानी का उपयोग अन्य जीव जंतु लाते हैं एंव पेड़ पौधे भी पानी कि वजह से जीवित रहते हैं यानि जल है तो जीवन है अन्यथा जीवन संभव नहीं है।

नदियों का अस्तित्व संकट में

अनूपपुर जिले में इन दिनों नदियों के मीठे पानी पर बांध बनाकर मानव जीवन और अन्य जीवों का जीवन संकट में डाला जा रहा है, अभी वर्तमान में केवई नदी का नाम सामने आ रहा है जिसे जीवन दायिनी कहा जाता है लेकिन इस पर बांध बनाने को रोकने कि लड़ाई जारी हैं। वर्तमान में पचखुरा और छतई के बीच में केवई नदी बहती है जिसका जल मीठा है, जिससे जल संकट होने पर केवई वहां के आस पास के लोगों को जल संकट के अभाव से दूर रखता है लेकिन अडानी थर्मल पावर प्लांट के बांध बनाने से केवई नदी के अस्तित्व से लेकर जन जीवन, वन्य जीवन तथा पर्यावरण जीवन संकटों के घेरे में आ चुका है, कंपनी के अभियंता कहते हैं कि यह नार्मल बांध है महज तीन सालों के लिए है और जल के प्रवाह को चलने देने के लिए हम पाइपों के माध्यम से व्यवस्था बना देंगे, तीन फिट के ऊपर से पानी बहती रहेगी पाइपों के माध्यम से गेट नहीं बनाएंगे,और तीन साल बाद डैम तोड़ देंगे। सोचने वाली बात है कि बांध में कंपनी की प्रदूषित जल को छोड़ा जाएगा, जिसका पानी आम जनमानस, वन्य जीव, स्थानीय जीव पशु पक्षी तथा मृदा प्रदूषण होती रहेगी एंव कंपनी के चिमनी से निकलने वाले धुएं पर्यावरण को प्रदूषित कर मुनाफा कंपनी तथा रसूखदार व्यवस्थाओं को लाभान्वित करेगी, नदियो का पानी पहले बिना फिल्टर के पानी पी सकते थे लेकिन अब फिल्टर करने के बाद पीना पड़ेगा लेकिन बीमारियों का निमंत्रण शुरू हो जाएगा। वर्तमान में जिले पर चल रही उद्योगपतियों की यह “विनाश लीला” का क्या परिणाम निकल आएगा यह देखना बांकी है तथा केंद्र, राज्य की कुर्सियों में बैठे भूमि पुत्र सरकारें विकास की आड़ में हो रहे “विनाश लीला” को रोक पाने में सक्षम होती हैं या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा।

Leave a Comment

और पढ़ें

Orpheus Financial

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें

error: Content is protected !!