जब जमीर मर जाता है, तो इंसान को हर चीज ‘प्रोडक्ट’ नजर आने लगती है। यहाँ तक कि वह ‘प्रकृति’ और ‘माँ’ को भी मुनाफे की तराजू पर तौलने लगता है। ऐसे लोगों के शब्दकोश में ‘पवित्र’ जैसा कोई शब्द नहीं बचा है। इनके लिए तो कुदरत एक ‘मुफ्त की सेल’ है जो शायद इन्हीं के लिए लगाई थी। कंक्रीट का जंगल और कागजी हरियाली के नाम पर ये वो लोग हैं जो शहर के फेफड़े (जंगल) काटकर वहाँ आलीशान ‘ग्रीन वैली’ नाम की कॉलोनी काटते हैं। विडंबना देखिए—जहाँ कल तक असली कोयल कूकती थी, वहाँ आज ये प्लास्टिक के गमले रखकर ‘नेचर के करीब’ होने का बोर्ड लगाते हैं। ये प्रकृति का सौदा इतनी सफाई से करते हैं कि नदी को नाला बनाने के बाद, उसी नाले के किनारे ‘रिवर फ्रंट’ का सपना बेच देते हैं। ‘माँ’ का नाम, व्यापार का काम पर इनकी बेशर्मी का सबसे वीभत्स रूप तब दिखता है जब ये ‘मिट्टी’ और ‘मर्यादा’ को दांव पर लगा देते हैं। इनके लिए धरती ‘माँ’ नहीं, केवल एक ‘इनवेंटरी’ (माल) है। ये उस कोख को भी खोदने से बाज नहीं आते जिसने इन्हें अनाज दिया। कभी ये व्हीव्हीआईपी कल्चर वाले सूट बूट के साहबजादे पहाड़ों का सीना चीरकर पत्थर निकालते हैं, तो इन्हें चीखें नहीं सुनाई देतीं, इन्हें बस ट्रकों की गिनती याद रहती है। ऐसे लोगों के पास ‘ईमान’ का ई-कॉमर्स है। इन सौदागरों का बस चले तो ये बादलों पर भी अपना ‘लोगो’ लगवा दें और बारिश की हर बूंद का बिल आपके घर भेज दें। ये वो लोग हैं जो सार्वजनिक कुओं को पाटकर मिनरल वाटर की बोतलें बेचते हैं। इनकी नीचता में दिखता है कि ये ‘अभाव’ पैदा करते हैं ताकि अपना ‘प्रभाव’ बेच सकें। ताकि बेशर्मी का सर्टिफिकेट ये खुद बांटे सबसे मजेदार बात तो यह है कि ये लोग समाज के ‘प्रतिष्ठित’ स्तंभ बने बैठे हैं। शाम को किसी सेमिनार में जाकर ‘पर्यावरण बचाओ’ पर भाषण देंगे और सुबह उठकर अपनी अगली साइट के लिए दो सौ साल पुराने पेड़ पर आरा चलवा देंगे। ये प्रकृति का सौदा करने के बाद ‘गंगा स्नान’ भी कर आते हैं, मानो गंगा मैया इनके पाप धोने के लिए इनके साथ ‘पार्टनरशिप’ में बैठी हों। इन ‘बेशर्मों’ को लगता है कि इन्होंने बहुत बड़ी जागीर खड़ी कर ली है। पर हकीकत यह है कि ये उस डाल को काट रहे हैं जिस पर इनका खुद का घोंसला टिका है। जब शुद्ध हवा का ‘सिलेंडर’ भी इनके बैंक बैलेंस से ज्यादा महंगा हो जाएगा, तब इन्हें अपनी ‘होशियारी’ पर रोना आएगा। लेकिन तब तक, शायद बेचने के लिए इनके पास सिर्फ अपनी ‘राख’ ही बची होगी। यह बहुत ही कड़वा सच है कि आज के दौर में जिसे हम ‘प्रगति’ कहते हैं, वह असल में ‘प्रकृति’ की नीलामी बन चुकी है। जहाँ संस्कारों की जगह स्वार्थ ले ले, वहाँ व्यंग्य भी तीखा हो जाता है। “सब कुछ” बेच देने को ही होशियारी समझते हैं। बाज़ार में लगी ‘माँ’ की नुमाइश पर आजकल शहर में एक नया धंधा चला है—’सब कुछ बेच दो’। इन लोगों के पास दिल नहीं, केवल ‘कैलकुलेटर’ होता है। ये वो महानुभाव हैं जो बरगद की छाँव नहीं देखते, बल्कि यह देखते हैं कि उसे काटकर कितने किवाड़ और कुर्सियां बनेंगी। इनके लिए नदी ‘जीवनदायिनी’ नहीं, बल्कि मुफ़्त का ‘पानी ढोने वाला ट्रक’ है। जंगल इनके लिए ऑक्सीजन का स्रोत नहीं, बल्कि एक ‘रियल एस्टेट प्रोजेक्ट’ है जो गलती से पेड़ों से ढका हुआ है। साहब, ये वो लोग हैं जो सूरज की पहली किरण का स्वागत नहीं करते, बल्कि सोचते हैं कि अगर धूप को ‘प्रीमियम सब्सक्रिप्शन’ पर बेचा जा सकता, तो कितना मुनाफा होता। मिट्टी को ‘माँ’ तो कहते हैं, लेकिन सिर्फ तब तक, जब तक उसका ‘स्क्वायर फीट’ रेट न पता चल जाए। रेट पता चलते ही ये अपनी ‘माँ’ की गोद में भी कंक्रीट के पिलर गाड़ देते हैं। इनकी “बेशर्मी” का आलम तो देखिए, ये प्रकृति का सौदा करके उसे ‘डेवलपमेंट’ का नाम देते हैं। ये पहाड़ों को नंगा कर देते हैं और फिर उसी जगह पर ‘हिल व्यू रिसॉर्ट’ बनाकर लोगों को प्रकृति के दर्शन कराते हैं। इन सौदागरों को लगता है कि ये बहुत अमीर हो रहे हैं। पर शायद ये भूल गए हैं कि जब आखिरी पेड़ कटेगा और आखिरी नदी सूखेगी, तब इन्हें समझ आएगा कि नोटों को चबाया नहीं जा सकता और सोने के सिक्कों से प्यास नहीं बुझती। ऐसे लोग कितने भी हाईटेक हो जाएं रोटी गूगल से डाउनलोड नहीं कर पाएंगे उसके लिए खेती करनी ही पड़ेगी, कितना भी मिनरल वॉटर पी लो, प्यास तो पहाड़ो से छन कर आने वाली फिल्टर शुद्ध पेय से ही प्यास बुझेगी।
-आज़ाद मुसाफिर













